Monday, 12 February 2018

सर आनन्द स्वरूप जी कृत ’दीन व दुनिया’ नाटक में लोकतत्वों का अनुशीलन


सर आनन्द स्वरूप जी कृत दीन व दुनिया नाटक में 
लोकतत्त्वों का अनुशीलन

सर आनन्द स्वरूप साहबजी महाराज ऐसे प्रथम सन्त हुए जिन्होंने स्वराज्य शरणाश्रम का सपूत संसार चक्र और दीन व दुनिया नामक कुल चार नाटक लिखे जो लोकतत्त्वों की दृष्टि से श्रेष्ठ कहे जा सकते हैं। ये नाटक मौलिक हैं जिन पर न तो पाश्चात्य नाटकों का प्रभाव है और न ही विविध भाषाओं के नाटकों का। इनकी ओर हिन्दी नाटक साहित्य जगत का ध्यान ही नहीं गया। इनके नाटकों में लोकजीवन के सभी पक्षों का चित्रण करते हुए जीव के लोक का ही नहीं वरन्‌ परलोक का कल्याण करना भी सहबजी महाराज का उद्देश्य है। यदि इस युग के अन्य नाटककारों ने सर आनन्दस्वरूप साहबजी महाराज के नाटकों से प्रेरणा लेकर नाट्‌य रचना की होती तो प्रसाद युगीन नाट्‌य जगत को एक नई दिशा मिल गई होती और ये युग लोकतत्त्वों का ह्रास युग न कहलाकर लोकतत्त्वों का समृद्ध युग कहा जा सकता था।

सर आनन्दस्वरूप साहबजी महाराज कृत ‘दीन व दुनिया नाटक एक आध्यात्मिक नाटक है।जिसके कथानक में ‘दुनिया की दिलफ़रेबियों और दीन के आशिकों की परेशानियों का निहायत दिलचस्प व मुअस्सर पैराये में बयान करके दीन की मंजिल पर पहुँचने का आसान तरीका बतलाया गया है। दीन व दुनिया' नाटक में नियति के समान फ़रिश्ते का प्रकट होना लोकरूढ़ि को दर्शाता है। फ़रिश्ता बार—बार आकर चन्द्रहास का मार्ग—दर्शन करता है। फ़रिश्ते का चन्द्रहास के समक्ष प्रकट होना लोक विश्वास को जीवन्तता ‘प्रदान करता है। उद्धरण—

“फरिश्ता—     चन्द्रहास!  चन्द्रहास! देखते हो मुझको?
चन्द्रहास —    जी हाँ देखता हूँ आप कौन हैं? मुझे समाधि से क्यों उठाया?
फ़रिश्ता—    उस कादिर मुतलक की आफ़रीनिश का एक ज़र्रा हूँ। फ़रिश्ता कहलाता हूँ, तुम्हारे लिये खुशखबरी लाया हूँ। खुशखबरी सुनाने के लिये तुम्हें समाधि से उठाया है।”

लोक विश्वास का एक अन्य उदाहरण‘इस प्रकार है—

“यह तीन दाने जंगली चावलों के हैं। जंगल के रहने वाले कहते हैं कि इनके खा लेने से तीन बरस तक भूख न लगेगी और यह बूटी है— इसके अर्क के तीन घूँट पी लेने से तीन बरस तक प्यास न लगेगी। इसकी मदद से तीन बरस बेखटके समाधि लगा सकूँगा।”

दीन व दुनिया' नाटक लोक स्वभाव को विशेष सौन्दर्य प्रदान करता है। लोक के अनुसार पति—पत्नि का स्वभाव ‘इस प्रकार दिखाई पड़ता है—
 “मर्द—यह कम्बख़्त मेरा ज़रा कहना नहीं मानती। खाना पकाती है सानी से बदतर। कभी नमक इतना ज्यादा कि खाना ज़हर सा कड़बा.‘कभी इतना कम कि पानी सा फीका। कोई तफ़रीह के लिये काम करूँ तो बस अंगारा बन जाती है और जब देखो यही फ़रमायश। यह जेवर ला दो, वह कपड़ा ला दो। नाक में दम कर रखा है कम्बख़्त ने। मुझे पहले मालूम होता तो कभी इससे शादी न करता।”

भिखारी—भिखारिन की भीख माँगने की प्रवृत्ति का वर्णन किया गया है। साहूकार की लोभी प्रवृत्ति को दिखाया गया है, जिसे सामने रखे खाने से अधिक लगाव अपने लेखे में है। चन्द्रहास के साहूकार से खाना न खाने और लेखे में मग्न होने का कारण पूछने पर साहूकार अपने स्वभाव का प्रमाण स्वयं देते हुए कहता है कि “साहूकार—     महाराज! साहूकारों की खुराक सूद है। सूद न हो तो खाना किस काम का? 
चन्द्रहास—     तुम्हारी सलाना आमदनी कितनी है? 
साहूकार—     आमदनी का क्या है? बहुत भी है और कुछ भी नहीं संसार में एक से एक बढ़के सेठ भरे हैं। उनके सामने मैं क्या हूँ? कुछ भी नहीं हूँ।”

‘दीन व दुनिया' नाटक लिखने के पीछे नाटककार का मूल उद्‌देश्य लोक मांगल्य था। लेखक ने संसारी पदार्थों एवं माया के जाल में फँसे हुए जीव के कल्याण हेतु इस नाटक की रचना की ताकि जीव अपने मुख्य लक्ष्य से विमुख न होकर लोक को ही नहीं, बल्कि परलोक को भी सरल कर सके। क्योंकि मनुष्य जगत की भोग—वासनाओं में इस तरह लिप्त हो चुका है कि उसे इस संसार में अपने आने का कारण ही नहीं पता। इसी संदर्भ की पुष्टि करता चन्द्रहास का निम्नलिखित संवाद देखिए—


“चन्द्रहास—आखिर दुनिया में आने का कोई मतलब भी होना चाहिए। मुझे यह पसन्द नहीं कि निरे जानवरों की सी जिन्दगी बसर करूँ—जैसे तैसे पेट भर लूँ, अंडे बच्चे पैदा कर दूँ और एक दिन मिट्‌टी में मिल जाऊँ! पर क्या करूँ? किससे पूछूँ? किधर जाऊँ? अब वापस न जाऊँगा। इसी पेड़ के नीचे समाधि लगाऊँगा और फैसला करके ही उठूँगा।“
 वस्तुतः यह नाटक साधन से साध्य की ओर ले जाता है, जो आत्मा को अपने अस्तित्व के प्रति जागरुक करता है।

प्रस्तुत नाटक का रंगमंच प्राकृतिक एवं अकृत्रिम है। रंगमंचीय साज—सज्जा बाह्य चमत्कारों एवं दिखावे से निर्लेप है। नाटक का श्रीगणेश जंगल से होता है, जहाँ एक पेड़ के नीचे चन्द्रहास नाम का पात्र टहल रहा होता है। चन्द्रहास बदस्तूर समाधि में बैठा है। इर्द—गिर्द घास बढ़ गई है। दीमक ने उसके बदन पर मिट्‌टी चढ़ा दी है। चिड़ियों ने उसकी गर्दन के पीछे घोंसला बना लिया है। सुबह चार बजे का वक्त है। ”इसके अतिरिक्त दुनिया का मकान, साहूकार की दुकान, बाज़ार का दृश्य और अन्ततः दीन का पहाड़ी की सीढ़ियाँ इत्यादि दृश्य एक सफल रंगमंच को प्रस्तुत करते हैं। दीन व दुनिया' नाटक में रंगरूढ़ियों का विशेष ध्यान रखा गया है। नाटक का प्रारम्भ ईश्वरीय वंदना से चल कर लोक कल्याण के गान पर समाप्त होता है। नियति या भाग्य के समान ही इस नाटक में भी फ़रिश्ता स्थान—स्थान पर चन्द्रहास का पथ—प्रदर्शन करता है। जिस प्रकार आकाश भाषित संवाद और प्रकाश रंगरूढ़ि की शोभा को चार—चाँद लगाते हैं, उसी भाँति फरिश्ते का आगमन एवं प्रस्थान भी इसी ओर इंगित करता है। ‘नाटक में नूरानी रोशनी का प्रकट होना, पहाड़ी के शिखर पर चमक—प्रकाश और सब्जबाग इत्यादि के दृश्य पूरी सफलता के साथ निभाए गए हैं। नाटक एक चित्रात्मक शैली का प्रस्तुतीकरण करता है। रंगकर्मियों का मंच पर आकर गाना बजाना रंगरूढ़ि के नियम का पालन करता है। सोदाहरण— ‘चन्द्रहास सो जाता है। थोड़ी देर बाद औरत कमरे में आती है। चन्द्रहास को बेहोश सोता देखकर मुस्कराती है और सिरहानखड़ी होकर नरम लहजे में गाती है— कैसा जादू चलाया दुनिया ने। कैसा साधू बनाया दुनिया ने।''


‘दीन व दुनिया' का उद्‌देश्य जन—चेतना द्वारा नैतिक आदर्शों की स्थापना द्वारा सर्व जन कल्याण करने का है।  इसलिए नाटककार ने भारतीय संस्कृति की आचार-विचार की परम्परा का निर्वाह भी किया है। दुनिया तथा उसकी लड़कियों द्वारा चन्द्रहास का स्वागत और मेहमानवाजी निभाना भारतीय सभ्यता का पालन करना है। औरत द्वारा चन्द्रहास का हाथ-मुँह धुलवाना, इच्छा का नाश्ता परोसना, अँगूर का अर्क पिलाना, पलँग पर बिस्तर बिछा कर सुलाना आदि बिन्दु इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं कि भारतीय समाज अतिथि देवो भवः की मान्यता का अनुसरण करता है।दीन व दुनिया’ का उद्देश्य जन-चेतना द्वारा नैतिक आदर्शों की स्थापना द्वारा सर्व जन कल्याण करने का है। इसलिए नाटककार ने भारतीय संस्कृति की आचार-विचार की परम्परा का निर्वाह भी किया है। दुनिया तथा उसकी लड़कियों द्वारा चन्द्रहास का स्वागत और मेहमानवाजी निभाना भारतीय सभ्यता का पालन करना है। औरत द्वारा चन्द्रहास का हाथ-मुँह धुलवाना, इच्छा का नाश्ता परोसना, अँगूर का अर्क पिलाना, पलँग पर बिस्तर बिछा कर सुलाना आदि बिन्दु इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं कि भारतीय समाज अतिथि देवो भवः की मान्यता का अनुसरण करता है। संदर्भित नाटक में आंगिक और वाचिक अभिनय नाटकीय एवं अभिनय के गुणों को दर्शाता है। पात्रों द्वारा किया जाने वाला अभिनय रचना को सौन्दर्य प्रदान करता है। ग्लोब में से औरत का निकल कर इधर-उधर देखना, हैरान होना, चन्द्रहास का शर्माना, औरत का चन्द्रहास को उछल कर तमाचा मारना, चन्द्रहास द्वारा जम्हाई लेना, औरत का नाक भौं चढ़ाना, चन्द्रहास को दुनिया व लड़कियों द्वारा चटाई में लपेटकर अन्दर छिपाना, चन्द्रहास का काँपकर तोतली आवाज़ में बोलना आदि दृश्यों को लेखक ने पाद-टिप्पणियों के नाम से परिचित करवाया है। अभिनयता को प्रस्तुत करता एक उद्धरण-

 ”चन्द्रहास- (अंगूर खाकर) बड़ा मीठा है। मैंने तो यह फल कभी खाया ही न था। इसको अंगूर कहते हैं न?
दुनिया-       हाँ अंगूर कहते हैं। (दूसरा अंगूर पेश करके) लो यह भी खाओ।(चिल्लाकर) अरी इच्छा। जल्दी से लाओ भाई अंगूरों का अर्क। (इच्छा छोटे गिलास में अर्क पेश करती है। चन्द्रहास गिलास मुँह से लगाता है और अर्क पीने लगता है।)
चन्द्रहास-     वाह वा वाह! कैसा उम्दा अर्क है।“


नाटक की भाषा में हिन्दी के साथ-साथ उर्दू, अरबी, फारसी मिश्रित शब्दों का प्रयोग किया गया है। जैसे-
”फ़रिश्ता- मगर करें क्या? मालिके दीन व दुनिया के हुक्म से जितने पैगम्बर, औलिया, ऋषि, सन्त और महात्मा इन्सानों के दर्मियान भेजे गये सबने रहबर की जरूरत की तलकीन (शिक्षा) की और पुरज़ोर अलफ़ाज में तलकीन की, लेकिन इन्सान सुनता ही नहीं, अपनी ही हाँकता है।“ 
 नाटक में आफ़रीनिश, लुत्फ, दुश्वारगुज़ार, मौरिदे रहमत, इत्तिला, सफ़ीर, तशरीफ़, पजमुर्दा, परवरदिगार, मसख़रा, गुलिस्ताँ, तौहीन, परीजाल, इब्तिदाई, कम्बख़्त, फ़रमायश, नहक, मुकामात, बखेड़ा, शुबह, इश्तियार, इत्मीनान्, यकसाँ, मिक़दार, तअल्लुक, पाकज़ात, और मसाफ़त आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है।नाटक के सभी अदाकर अपने रोल के अनुसार अभिनय करते हैं। अपने चरित्र के अनुकूल पात्रों ने भाषा का प्रयोग किया है। फ़रिश्ते और ईमान ने सात्मिक भाषा, दुनिया-इच्छा-विद्या व रागिनी ने चातुर्य एवं वाकपटुता का प्रयोग किया है। दुनिया अपने चरित्र के अनुसार चातुर्य पूर्ण सवादों का उच्चारण करती है- ”औरत-अरी अच्छा! देख, एक नौजवान तपस्वी आने वाला है। घार द्वार व बगीचा ख़ूब साफ कर। सोने-चाँदी के बर्तन तय्यार रख। शिकार हाथ से निकलने न पाये। जरा लड़कियों से भी कहला भेजना कि तय्यार रहें और इतिला मिलते ही फौरन् चली आवें। सफ़ीर भी जोर लगावेगा। जबरदस्त मुकाबिला है।“ इस प्रकार ‘दुनिया’ चन्द्रहास को अपनी बातों द्वारा माया-जाल में उलझा लेना चाहती है।


       भाषा को संक्षिप्त और प्रभावशाली बनाने के लिए लोक में प्रचलित आम मुहावरों, कहावतों और लोकोक्तियों का अंकन किया गया है, जो इस प्रकार हैं- दीमक के चाटे पेड़, हाथ-मुँह धोना, नाक में दम करना, चींटी के लिए रेंगना, भूले बाह्मण भेड़ खाई फिर खाये तो राम दोहाई, मुँह कड़वा होना, चिकनी-चुपड़ी बातें करना, हड्डियाँ चूर होना, दुम दबाकर भागना, आँखें नीची होना, भाड़ में झोंकना, गोबर के कीड़े की तरह रेंगना, अकल बड़ी या भैंस आदि।

‘दीन व दुनिया’ में पयुक्त होने वाले सभी नाटक प्रतीकात्मक हैं। नाटक के पात्रों के नाम प्रतीकों के आधार पर रखे गए हैं। फरिश्ता और ईमान ‘ईश्वर के दूत’ के रूप में पेश किए गए हैं, जबकि चन्द्रहास ‘जीव’ के रूप में। इसके अतिरिक्त अन्य पात्र भी प्रतीकात्मक हैं। चन्द्रहास दुनिया से उसकी लड़कियों के विषय में पूछता है, जो उनके प्रतीकात्मक होने के तथ्य को स्पष्ट करता है-

”चन्द्रहास-     ये लोग कौन हैं?

दुनिया-       मेरी लड़कियाँ हैं। यह विद्या है, यह रागिनी है और यह लक्ष्मी है। तीनों

इस्म-बामुसम्मा (यथा नाम तथा गुण हैं। आपके दर्शन के लिए आई हैं।


‘इच्छा द्वारा भी इस बात की पुष्टि की जाती है-

”इच्छा-सरकार मैं अभी शहज़ादियों को बुलवायें लेती हूँ, पर मुझे पुख़्ता यक़ीन है कि लक्ष्मीबाई की सहरकारी (मोहन-क्रिया रागिनीबाई की दिलफ़िगारी (उच्चाटन क्रिया और विद्याबाई की अफ़सूंनिगारी (वशीकरण-क्रिया के सामने इन सबकी एक न चलेगी। अतः लक्ष्मी ‘मोहन रागिनी ‘उच्चाटन’ और विद्या ‘वशीकरण’ का प्रतीक है। तीनों पात्र दुनिया के माया जाल की ओर संकेत करते हैं।


लेखक ने लोक की सहजता का ध्यान रखते हुए नाटक में लोकशैली का ही प्रयोग किया है, जिसमें प्रधान हैं- लोकगीत, लोक वाद्य एवं लोक संगीत। नाटक के छठे दृश्य में देखिए- ‘दुनिया के इशारे पर इच्छा

पँचरंगी फुलवार खिली बागन में।।

आओ सखी टुक सैर को चालें।

चलें फिरें कुछ देखें भालें।


अन्ततः सम्पूर्ण नाटक का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि लोकतत्त्वों की दृष्टि से यह एक सफल नाटक है जिसमें लोक की सहजानुभूति के साथ-साथ धर्म की छाप भी दिखाई पड़ती है।

साहबजी महराज के नाटक साहित्यिक न होकर आध्यात्मिक हैं। साहित्यिक नाटक लिखने के लिए शास्त्रीय नियमों एवं सिद्धान्तों का पालन करना पड़ता है जिनमें सहजानुभूति का दमन हो जाता है। जबकि लोकनाटक किसी भी प्रकार के शास्त्रीय बंधनों में आबद्ध नहीं होते। अतः इसी तथ्य को स्पष्ट करते हैं। साहबजी महाराज के नाटक जो लोक रंगमंच का आधार लेकर लोकतत्त्वों की बात करते हैं वस्तुतः कहा जा सकता है कि जनजीवन से संबंधित नाटक हैं।

Tuesday, 17 October 2017

समकालीन कथा साहित्य: आदिवासी और दलित जीवन की उपस्थिति



समकालीन कथा साहित्य: आदिवासी और दलित जीवन की उपस्थिति 

समकालीन दौर में तीन मुद्दों ने हिन्दी साहित्य में अपना ज्वलन्त रूप धारण किया हुआ है:- दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य और स्त्री साहित्य. ये सभी हाशियागत समुदायों की अस्मिता की अपनी अलग-अलग समस्याएँ हैं क्योंकि ये सभी वर्गों की उपस्थिति भारतीय समाज में उपेक्षित रही है। एक ऐसा साहित्य जो केवल दलितों और आदिवासियों के लिये ही लिखा गया हो, दलित और आदिवासी साहित्य कहलाता है। गैर दलित और आदिवासी साहित्य का लेखक केवल दलित या आदिवासी ही हो सकता है। यदि कोई गैर दलित या गैर आदिवासी लेखक दलित अथवा आदिवासी साहित्य लिखता है तो वह केवल दलितों एवं आदिवासी लोगों के लिये सहानुभूति मात्र ही है। “कुछ लोगों का मानना है कि गैर दलित लेखकों ने भी दलित साहित्य की रचना की है जिसमें प्रेमचन्द और राहुल साकृत्यायन जैसे रचनाकार भी शामिल हुये हैं, किन्तु उनकी दलित अवधारणा अस्पृश्यता-निवारण तक ही सीमित हो गई है। पुरानी शब्दावली में इसे दलित साहित्य का रसाभास कह सकते हैं। दलित, शूद्र, चमार, अन्त्यज आदि शब्दों से संबोधित किया जाता रहा है। इन सभी शब्दों के स्थान पर संविधान ने इन्हें ’अनुसूचित जाति’ का नाम दे दिया है। ’अनसूचित जनजाति’ के लिये ’आदिवासी’ शब्द दोनों के अन्तर को स्पष्ट करने में ज़्यादा सक्षम है। आज आदिवासी साहित्य भी अपनी स्वतन्त्र पहचान बना रहा है.” 1
आदिवासी समाज सदियों से जातिगत भेदोंवर्ण व्यवस्थाविदेशी आक्रमणोंअंग्रजों और वर्तमान में सभ्य कहे जाने वाले समाज द्वारा दूर-दराज जंगलों और पहाड़ों में खदेड़ा गया है। अज्ञानता और पिछड़ेपन के कारण उन्हें सताया गया है। शिक्षित न होने के कारण यह समाज सदियों से मुख्यधारा से अलग रहा। भारत में यह जनजातीय समाज विभिन्न भागों में तथा विभिन्न भाषिक प्रदेशों में हैं। आदिवासियों की लोक-कला साहित्य में सदियों से मौखिक रूप में ही रही है। उनकी भाषा का अदुरुस्थ व्याकरणलिपि का विकास न होने के कारण साहित्य जगत में आदिवासी रचनाकार और उनका साहित्य गैर-आदिवासी साहित्य की तुलना में कम मिलता है। स्वतन्त्रता के बाद प्रकाश में आए दलित और स्त्री-विमर्श के बाद का विमर्श आदिवासी विमर्श  कहलाता है।
प्रो.  वीर भारत तलवार का मानना है कि-आदिवासी संस्कृति का सवाल, आदिवासियों की भाषाओं का सवाल, उनके धर्म का सवाल कभी किसी ने नहीं उठाया। मैं आपको एक उदाहरण दूं, आदिवासी संस्कृति की कोई गहरी जानकारी गैर-आदिवासियों को नहीं है। उनका एक नितांत अलग दृष्टिकोण आदिवासियों की संस्कृति के बारे में बना हुआ है। इसलिए हम उस सवाल को उठा ही नहीं सकते और मैंने जैसा कहा कि आदिवासी खुद उस प्रकार से विमर्श नहीं करते हैं कि एक विमर्श खड़ा हो।“ 2
अब प्रश्न उठता है कि वास्तव में आदिवासी साहित्य है क्या ? क्या आदिवासी विषय पर लिखा गया साहित्य आदिवासी साहित्य है? या आदिवासियों द्वारा लिखा गया साहित्य आदिवासी साहित्य है? अथवा आदिवासियत’ (आदिवासी दर्शन) के तत्वों वाला साहित्य ही आदिवासी साहित्य है? पहली मान्यता में गैर आदिवासी लेखकों की श्रेणी है, परन्तु समर्थन में कुछ आदिवासी लेखक भी हैं- जैसे रमणिका गुप्ता, संजीव, राकेश कुमार सिंह, महुआ माजी, बजरंग तिवारी गणेश देवी आदि गैर आदिवासी लेखक हैं और  हरिराम मीणा, महादेव टोप्पो, आईवी हांसदा इत्यादि आदिवासी लेखक हैं दूसरी अवधारणा उन आदिवासी लेखकों और साहित्यकारों की है जो जन्मना और स्वानुभूति के आधार पर आदिवासियों द्वारा लिखे गये साहित्य को ही आदिवासी साहित्य मानते हैं तीसरा मत उन आदिवासी लेखकों का है जो आदिवासियत के तत्वों का निर्वाह करने वाले साहित्य को ही आदिवासी साहित्य के रूप में स्वीकार करते हैं आदिवासी साहित्य मुख्यधारा की संस्कृति के दायरे से बाहर रहकर आदिवासियों के जीवन को व्यक्त करनेवाला, उनकी संस्कृति, परम्पराएँ, संघर्ष, इतिहास को एक स्तर से ऊपर उठाने वाला साहित्य है बहुत सारे साहित्यकारों ने आदिवासियों के उन प्रश्नों की तरफ ध्यान देने वाले साहित्य का निर्माण किया है जो आदिवासियों में प्रेरणा, जागरुकता, अपने हक के लिये लड़ने की शक्ति दे सके समय-समय पर गैर आदिवासी रचनाकारों ने भी आदिवासी जीवन और समाज को अभिव्यक्त किया साहित्य में आदिवासी जीवन की प्रस्तुति की इस पूरी परम्परा को हम समकालीन आदिवासी साहित्य की पृष्ठभूमि के तौर पर रख सकते हैं
आरंभिक और ज्यादातर आदिवासी साहित्य गीत या कविता के माध्यम से हमारे सामने आता है। आदिवासी कवियों में वाहरु सोनवणेहरिराम मीणाअनुज लुगुनकेशव मेश्राममहादेव टोप्पोडॉ.रामद्याल मुंडादिनानाथ मनोहरआदि. का नाम विशेष रुप से लिया जाता हैं। डॉ. मंजू ज्योत्स्ना ने ब्याह’ कविता, सरिता बड़ाइक मुझे भी कुछ कहना है’ आदि कविताएँ लिखीं हैं  ये कवियत्रियों ने  अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक वैयक्तिक जीवन-संघर्ष की समस्याओं को व्यक्त किया है। आदिवासी कविताओं में विभिन्न सामाजिक विद्रोहनारी का जीवन-संघर्षविस्थापनअस्तित्व की समस्या और शिक्षा जैसी समस्याएँ प्रमुख रूप से देखी जाती हैं जिसके लिए आदिवासियों को समय-समय पर आंदोलनविद्रोह, और क्रांतियाँ आदि  करनी पड़ी हैं। पुर्वोत्तर के आदिवासियों का आंदोलन अपनी पहचान का आंदोलन है। एक सौ पचास वर्ष पहले से वहाँ आदिवासी साहित्य रचा जाने लगा है। जो लोकगीतलोककथाओं के मौखिक रुप में मिलता है। असम, मिजोरामनागालैंडमणिपूर का आंदोलन अपनी अस्मिता के साथ साहित्य को ढूँढने की कोशिश कर रहा है। वहाँ पर आज बोड़ो साहित्य लोकगीतोंलोककथाओं और लोकगाथाओं में देखने को मिलता है। कवियों, कहानीकारों एवं उपन्यासकारों ने बोड़ो साहित्य की समृद्ध परंपरा को चलाया है। अपनी संस्कृति को बचाने में एक होकर आदोलन को सशक्त बनाया है। भारत का पूर्वोत्तर भाग आज भी अपने मुलभूत हकों के लिए लड़ रहा है उनके प्रदेश में देशी और विदेशी घुसपैठ के कारण वह खुद अपनी संस्कृतिपरंपरा और आदिम मूल्यों को घृणा की दृष्टि से देखने लगा है। वहाँ के लोगों का साहित्य देखा जाए तो उनकी कविताओं में वह पीड़ा एवं संकल्प को अभिव्यक्त करता है। आज भी वहाँ अपनी मूल संस्कृति और भाषा बचाकर रखने में कामयाब है। पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव एवं अपने ऊपर लादे गए संस्कार को वह व्यंग्य रुपी शब्द बाणों से भेदता है। ऐसे ही- मेघालय के कवि पॉल लिंग दोह’ की बिकाऊ है’ कविता में कवि मन अपनों को ही कोसता है- बिकाऊ है हमारा स्वाभिमान / हमारी मान्यताएँ / हमारी सामूहिक  चेतना / अतिरिक्त बोनस : ये सारी चीजें लुटाने के भाव उपलब्ध है। / विशेष: संपर्क के लिए टेलिफोन नंबर की जरुरत नहीं / हमारे एजंट हर कहीं है।3
1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण की नीतियों से तेज हुई आदिवासी शोषण की प्रक्रिया के प्रतिरोध स्वरूप आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पैदा हुई रचनात्मक ऊर्जा आदिवासी साहित्य है। इसमें आदिवासी और गैर-आदिवासी रचनाकार बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। इस साहित्य का भूगोल, समाज, भाषा, संदर्भ शेष साहित्य से उसी तरह पृथक है जैसे स्वयं आदिवासी समाज, और यही पार्थक्य इसकी मुख्य विशेषता है। यह आदिवासी साहित्य की अवधारणा के निर्माण का दौर है। आदिवासी साहित्य अस्मिता की खोज, शोषकों द्वारा किए गए और किए जा रहे शोषण के विभिन्न रूपों के उद्घाटन तथा आदिवासी अस्मिता व अस्तित्व के संकटों और उसके खिलाफ  हो रहे प्रतिरोध का साहित्य है। यह उस परिवर्तनकामी चेतना का रचनात्मक हस्ताक्षेप है जो देश के मूल निवासियों के वंशजों के प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव का पुरजोर विरोध करती है तथा उनके जल, जंगल, जमीन और जीवन को बचाने के हक में उनकेआत्मनिर्णय के अधिकार के साथ खड़ी होती है।
महाराष्ट्र में आदिवासी बहुत ताकतवर हैं। झारखंड के बाद शायद वहीं ज्यादा ताकतवर हैं। आदिवासियों के बड़े-बड़े साहित्य सम्मेलन होते हैं और अब तक नौ आदिवासी सम्मेलन हो चुके हैं। महाराष्ट्र के ज्यादातर आदिवासी मराठी भाषा में अपना साहित्य लिखते हैं। बहुत कम लोग हैं जिन्होंने अपनी आदिवासी भाषा में साहित्य लिखा और जो लिखा वह भी बहुत कम लेखकों ने लिखा।4 साहित्य जगत में आदिवासी मुद्दों को उठाने, उनसे जुड़े सृजनात्मक साहित्य को प्रोत्साहन देने में बहुत सारी पत्र-पत्रिकाओं ने भी अहम योगदान दिया है- युद्धरत आम आदमी,अरावली उद्घोष, झारखंडी भाषा साहित्य, संस्कृति अखड़ा’, ‘आदिवासी सत्ताआदि। इनके अलावा तरंग भारती के माध्यम से पुष्पा टेटे, ‘देशज स्वर के माध्यम से सुनील मिंज और सांध्य दैनिक झारखंड न्यू्ज लाइनके माध्यम से शिशिर टुडु आदिवासी विमर्श को बढ़ाने में लगे हैं। बड़ी संख्या में मुख्यधारा की पत्रिकाओं ने आदिवासी विशेषांक निकालकर आदिवासी विमर्श को आगे बढाने में मदद की है, जैसे- समकालीन जनमत दस्तक’, ‘कथाक्रम’, ‘इस्पातिकाआदि। शुरू में हिंदी की प्रमुख पत्रिकाओं ने आदिवासी मुद्दों को छापने में उतनी रुचि नहीं दिखाई लेकिन अब विमर्श की बढ़ती स्वीकारोक्ति के साथ ही इन पत्रिकाओं में आदिवासी जीवन को जगह मिलने लगी है। छोटी पत्रिकाओं में आदिवासी लेखकों को पर्याप्त जगह मिल रही है।5
उडि़या में गोपीनाथ मोहांती कृत ’अमृत संतान’ और ’प्रजा’ जैसे उपन्यास लिखकर आदिवासी साहित्य में जान डालने का सफल प्रयास किया है। किस्सागो को आदिवासी साहित्य के लिये नोबेल पुरस्कार मिला है। अभी मारंगगोड़ा और ग्लोबल गांव के देवता वगैरह की चर्चा बल पकड़ रही है। धूणी तपे तीरकी बाजार में जो सफलता है, वो राजस्थान के एक बहुत बड़े आंदोलन से जुड़े होने के कारण है। किशन पाल परख कृत ’पथेरा’ (कहानी संग्रह), विपिन बिहारी का ’हमलावर’ उपन्यास, परमानंद राम का ’एकलव्य’, शीलबोधी का ’कोलार जल रहा है’, रमणिका गुप्ता का ’सीता-मौसी’ उपन्यास, ’बहू जुठाई’ कहानी संग्रह, ’भीड़ सतह में चलने लगी है’, ’भला मैं कैसे मरती’, ’आदमी से आदमी तक’, ’विज्ञापन बनते कवि’ कविता संग्रह, सरिता बड़ाइक का ’नन्हें सपनों का सुख’ कविता संग्रह, केदारनाथ मीणा कृत ’आदिवासी कहानियाँ’, कैलाश चन्द्र चौहान द्वारा रचित ’भँवर’ उपन्यास, पूनम तूषामड़ रचित कहानी संग्रह ’मेले में लड़की’, ओमप्रकाश बाल्मीकि कृत ’छतरी’, मोहनदास नैमिशरा द्वारा लिखित ’महानायक बाबा साहब डा अम्बेडकर’ उपन्यास, श्यौराज सिंह बेचैन का ’क्रौंच हूँ मैं’, ’नई फसल’ काव्य संग्रह, 'मेरा बचपन मेरे कंधों पर' आत्मकथा, जयप्रकाश कर्दम द्वारा लिखित ’खरोंच’ कहानी संग्रह आदि लेखकों ने आदिवासी जीवन पर जो रचनाएँ लिखीं वे विशेष उल्लेखनीय हैं
यदि आदिवासी साहित्य का जन्म उड़िया से हुआ है तो हिन्दी में दलित विमर्श मराठी साहित्य से आया है. हिन्दी साहित्य दलित चिंतन के बिना अधूरा है। इसकी गूँज सन 1980 के बाद ही हुई है हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव कहते हैं कि- “ यदि हमारा साहित्य दलित साहित्य के लिये जगह नहीं छॊड़ता तो वह शीघ्र ही अप्रासंगिक हो जायेगा “ 6  दलित साहित्य का उदभव माराठी में बाबूराम बाबुल की ’जेबहा मी जात चोर ली’ कहानी संग्रह से हुआ है।  नया पवार की ’बलुआ’, लक्ष्मण माने की ’उपरा’,  लक्षमण गायकवाड़ की ’उठाईगीर’, शंकरराव खरात की ’जीर्ण आमुचं’, सोन कामले की ’यादों के पंछी’, माराठी साहित्य में विशिष्ट स्थान रखती हैं। हिन्दी में ओमप्रकाश बाल्मीकि का ’जूठन’, तुलसीराम कृत ’मुर्दहिया’ आत्मकाथाएँ दलित साहित्य का मेरूदन्ड हैं। मराठी दलित साहित्य का आधार यदि फुले और अंबेडकर हैं तो हिन्दी में कबीर और राहुल साकृत्यायन का गहरा प्रभाव है।
“गैर दलित रचनाकारों की रचनाओं में दलितों की मुक्ति का स्वप्न भले ही न हो, किन्तु उनके माध्यम से दलितों के जीवन की यातना और पीड़ा का दस्तावेज तो तैयार हुआ ही है।  यथा रांगेय राघव का ’मुर्दों का टील”, ’कब तक पुकारूँ’, फणीश्वरनाथ रेणु का ’मैला आँचल’, आचार्य चतुर्सेन शास्त्री का ’सोमनाथ’, ’गोली’, ’उदयास्त’, पांडेय बेचन शर्मा उग्र का ’धनी का मोड़’ और ’प्रतीति’, रामदरश मिश्र का ’जल टूटता हुआ’, ’सूखता हुआ तालाब’, शिवप्रसाद सिंह का ’अलग अलग वैतरणी’, सीताराम का ’नमस्कार’, नरेन्द्र कोहली का ’अवसर’, अमृतलाल नागर का ’नाच्यो बहुत गोपाल’, मन्नु भंडारी का ’महाभोज’, यादवेन्द्र शर्मा का ’हज़ार घोड़ों का सवार’, गिरिराज किशोर का ’यथाप्रस्तावित’, ’परिशिष्ट’, रामकुमार वर्मा का ’मोतिया’, शैलेश मटियानी का ’नागवल्ल्री’, नागार्जुन का ’बलचनमा’, हरिसुमन बिष्ट का ’आसमान झुक रहा है’, महाश्वेता चतुर्वेदी का ’भाग्य का जादूगर’, ’ऐसी भक्ति करै रैदासा’ आदि. हिन्दी दलित साहित्य दलित लेखकों की दृष्टि से अधिक स्मृद्ध तो नहीं है किन्तु ओमप्रकाश बाल्मीकि, पुरर्षोत्तम सत्यप्रेमी, मोहनदास नैमिशराय, दयानंद बटोही, रघुनाथ प्यासा, शिवचन्द्र उमेश, कालीचरण स्नेही, बी.एल. नैयर, कुसुम वियोगी, प्रेम कपाड़िया, जयप्रकाश कर्दम, काबेरी, बुद्धशरण हंस, लालचन्द्र राही, पारसनाथ, सुशीला टाकभौरे, सी.बी.भारती, भागीरथ मेघवाल आदि मुख्य हैं. कविता के क्षेत्र में भी दलित लेखन सार्थक रूप से उभरा है। निराला की कविता ’भिक्षुक’, ’वह तोड़ती पत्थर’, ’विधवा’, बालकृष्ण शर्मा नवीन की कविता ’जूठे पत्ते’ और नागार्जुन की कविता ’हरिजनगाथा’ दलितों की यातना और लाचारी की अभिव्यंजना है। इन रचनाओं में दलित जीवन का चित्रण है, किन्तु दलितों की दुनिया नहीं. इसकी अभिव्यक्ति केवल दलित कवियों में ही मिलती है। इन कवियों में रामशिरोमणि होरिल की ’कील के काँट”, सुखबीर सिंह का ’बयान बाह”, मनोज सोनकर का ’शोषितनाम”, ओमप्रकाश बाल्मीकि का ’सदियों का संता”, पुरुषोत्तम सत्याप्रेमी का ’सवालों का सूर”, धर्मवीर का ’हीराम”, श्यामसिंह राशि का ’एकलव्” और जयप्रकाश कर्दम का ’गूँगा नहीं था मै” आदि ने हिन्दी दलित लेखन को सश्क्तता दी है।7 ’परती परिकथा’ में उपन्यासकार निर्धन, भूखी, पिछड़ी जनता की समस्याओं को ढूँढने का कार्य करता है जबक ’मैला आँचल’ में रेणु जी ने भयावह यथार्थ को सामने लाने का प्रयास किया है।  विमल चन्द्र पांडे की कहानी ’सोमनाथ का टाईमटेबल’ सामाजिक सरोकार के तहत एक दलित के प्रति सवर्णों के अपमानजनक रवैये का खुलकर विरोध करती है। मधु कांकरिया ने अपने उपन्यास  ’पत्ताखोर’ में सुनियोजित ढंग से गंदी बस्ती व संकरी गलियों एवं फुटपाथ पर रहने वाली ज़िन्दगी का  समाज के वंचितों, पीड़ितों और शोषितों के माध्यम से वर्णन किया है। चित्रा मुदगल की ’भूख’ कहानी मुंबई के स्लम जीवन को उद्घाटित करती है।
सदियों की मानसिक यातना, तिरस्कार, शोषण, अन्याय से जूझने के बाद 21 वीं सदी में आदिवासी और दलित जीवन को एक पहचान मिल पाई है। कोई भी समाज अथवा साहित्य वहाँ के प्रत्येक वर्ग, समुदाय, संस्कृति एवं सभ्यता से ही परिपूर्ण होता है। यदि समकालीन युगीन साहित्य में दलित और आदिवासी साहित्य को समावेशित नहीं किया जाता है तो साहित्य अधूरा एवं निर्जीव है। साहित्य की प्रासंगिकता तभी सार्थक व चिरंजीवी बनी रह सकती है जब उसमें समस्त समाज का लोक मांगल्य समाहित हो।   
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1.    फ़ॉरवर्ड प्रैस, मई 2015, पृष्ठ 31
2.    https://tirchhispelling.wordpress.com हिन्दी का आदिवासी विमर्श)
3.    सं.रमणिका गुप्ताआदिवासी लेखन एक उभरती चेतना, सामयिक प्रकाशन,संस्करण 2013 , पृष्ठ 69
4.    प्रो. वीर भारत तलवार, प्रख्यात हिन्दी आलोचक, ब्लाग स्पाट, जे एन यु
5.    फारवर्ड प्रेस ,बहुजन साहित्य वार्षिक ,अप्रैल, 2013 अंक
6.    श्यौराज सिंह चौहान बेचैन, उत्तर सदी के हिन्दी कथा साहित्य में दलित विमर्श, अनामिका प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ.76
7.    आदित्य प्रचण्डिया, साहित्य और संस्कृति का अंत संबंध, हिन्दी साहित्य निकेतन बिजनौर, 2015, पृ.211